सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

ठंढ में हाथ सेंकने जैसा है औरत पर बात करना
जलती लकडियाँ बुझीं तोह नहीं ये देखना है बस।
वो यूँ की चूल्हा जलाता रहे ,सब सुलगता रहे
पतीला धीरे धीरे गरम होता रहे
और सारी बात केवल इस बात तक रहे की
बाहर कुछ भी उफनने पाए भीतर चाहे जितना
जलता रहे.

4 टिप्‍पणियां:

  1. hashia par khadi aurat ke sajishoo kaa unhii pardafash kartee rahiyee har kadam par hum aake saath....

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छे....क्या कहने..... लिखती रहें....छापती रहें..बहुत अलग और बेहतर कविताएँ लिख सकती हैं आप।

    जवाब देंहटाएं