सोमवार, 29 जून 2009

औरतें तलाशती हैं
छत ,छाजन।
आँचल गीत
खोजती हैं
आकाश थोडी धूप
हकबकायी औरतें
ढूंढ रहीं हैं
दौरी सूप
वे खोजतीं हैं आग
उन्हें पकानी है रसोईं
पतझड़ हो गई
औरतें
स्तनों के बीच
तलाशती
बच्चे
पूछती हैं
आतंकियों से
कहाँ मिलेंगे अब
कोनें जिनमें छुपती
थीं वे मार खाकर

13 टिप्‍पणियां:

  1. एक संवेदना जगाने वाली कविता.... बहुत अच्छी, बधाई

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  2. बहुत सुन्दर और मन को छूने वाली कविता ---बधाई।

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  3. maine to socha bhi nahin tha ki ye lamhaa aisa hoga...yahaan aanaa hoga aur....itni pyari kavita se milnaa hogaa...!!

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  4. स्त्री के संघर्ष-महाकाव्य को शब्द देती सशक्त कविता.

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  5. sach mein aurau kaa khali pann bahut takleef dey hai.....isse shabdo mein bandhna bhii.........!!

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  6. यही तो नारी की विशेषता रही है........ लेकिन अति सदा ही गलत होता है........... और उसी संवेदना को आपने बखूबी बयां किया है......

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  7. Oh! to aap yahaan par hain! Nice To C U here! Ham Intazaar karenge!

    abt your cretions; it's superb! keep it up.

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  8. bahut hi sundar bhaaw liye huye kawita......ek khubsoorat si rachana

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  9. नारी व्यथा की अंतहीन कथा को खूबसूरती से शब्दो का अस्तित्व दिया है.
    बेहतरीन रचना

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  10. Jeewan hi kavita...
    Jeewan hi rachna...

    khud se kaha karti hoon :
    "Jin me rooh na ho...
    Aatm na ho...
    aise shabdon se bachna !"

    Shabd toh naav hain...
    Yahaan se wahaan jaane ka
    Ek zaria...
    Hamare hone ko gaane waala
    Naayaab Nazaria !

    Love U...

    Snowa Borno

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