मंगलवार, 18 अगस्त 2009



उस पार जिया है मेरा
और बीच में सागर पूरा
किस तरह तुम्हें समझाऊं
की मिलना रहा अधूरा
कोई कश्ती नहीं किनारे
कोई भी साथ नहीं रे .
वो दूर देश जा बैठे
दे गीली आँखें क्यों रे
मैं कैसे ये संदेसा लहरों पे लिखती जाऊं
इस पार किनारे पर हूँ
उस पार कहाँ से आऊँ
वे प्रियतम मेरे मन के
मेरी साँसों के तन के
क्यों लग कर मेरे अंग से
मुझको तट तक ले पहुंचे
नीला सागर दिखलाकर
थपका कर गीत सुनाकर
मेरे होंठों से मोती चुग कर
कहाँ गए रे
मेरे गालों पर उनके
चुम्बन के दाग पड़े हैं
मेरी आँखें ढूँढ़ रहीं हैं
सागर के पार किनारे
की शायद कोई कश्ती आकर के लगे वहां रे
और प्रियतम मेरे मन के फिर कस लें उसी तड़प से
मैं लहर लहर जीती हूँ
पूरा सागर पीती हूँ
तुम कश्ती बनकर आना
ले चलना मुझे किनारे
तब मैं सागर में खोकर
सिकता से मोती होकर
खो जाउंगी तुममें ही
प्रियतम
तुम सी ही धोकर