शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

 मेरी पूरी दुनिया
धीरे धीरे
होती है जिबह
सर से पाँव तक
मैं होती हूँ
शर्मसार तुमपर
 मैं भी पांच वक़्त कि नमाजी हूँ
 दुआ करती हूँ
कि
 तुम सोचो मुकम्मल
क्या नहीं जानते तुम
कि
धूप निकलती है
 मुझे बिना छुए
 और हवाओं में हों
 जाती है खुश्बू कम
 मै बन   गयी हूँ
बुत
फिर भी
 मेरी आँखों में समायी है
 तुम्हारा सच देखने की
 तीखी चाह
कैसी है
ये बात
कि
 मुझे बनाकर
बुत
तुम  नहीं
  हों पुजारी
 नहीं हों
परस्त बुत  !!

शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

हाँ मैं हूँ जंगली
मुझे नहीं आती
तुम्हारी बोली भाषा आभिजात्य
ओढ़ कर तुम्हारी हंसी का लबादा
नहीं लुटा सकती अपनी

अस्मिता अपने संस्कार !
मुझमें नहीं
इतनी ताक़त
कि पी जाऊं अपनी अस्मिता
और
परोसूं अपना वजूद !
हाँ मैं हूँ जंगली ..
नहीं जानती कि मुझमें है
ऐसा सौंदर्य
कि
सभ्यताएं पहन
तुम होते हों वहशी !
मगर मुझे आता है क्रोध
तुम्हारी संस्कृति पर!
मुझे आता है क्रोध
जब परम्पराओं की
चाशनी में लपेट तुम
शुरू करते हों
मुझको परोसना
हाँ मै हूँ जंगली
नहीं जानती
सभ्यता
पर इतना जानती हूँ कि
तुम शोषक हों
और मै हूँ शोषिता
हाँ मै हूँ जंगली
नहीं जानती सभ्यता!

सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

ब्रह्माण्ड में बैठी है
जो चुप्पी
इसे आप नहीं जानते
यह बोलती तो है
पर
अपनी आवाज़ में
जैसे बच्ची
जब मारी गयी हों
भ्रूण में.
कि उसकी आवाज़ भती है
गर्भ का
ओर छोर !
ठीक दोपहर
यह चुप्पी
आ खड़ी होती है चौपाल में
धूप लू की तरह
बरसती है
ताबड़तोड़
करती है
लहू लुहान
मारती है
जाने कितनों को
बिना हर्फों की ये जुबान!
ये चुप्पी जमती जाती है शिराओं में
जैसे
हाशिये पर
जब रुक जाता है वक़्त
इस चुप्पी की खातिर
लोग गंगा में नहाते हैं
की शायद
धुल ही जाए गर्भ का खून
पर वह धुलता नहीं
किसी तरह
चुप्पी बनाती जाती है
सन्नाटों के चक्रव्यूह !
चक्रव्यूहों के चक्रव्यूह !
इस चुप्पी को पीसता है
खेत में खडा बिजूका
जो आँधियों में
गिर गया है लगता
चुप्पी साधती है मौन
और होती है युद्ध रत
निरंतर !
यह चुप्पी आत्महंता की
होती है खतरनाक
कहती है है पूरी बात
करती है पूरा घात !

गुरुवार, 24 सितंबर 2009



क्या है औरत की देह
कि
वे देह विमर्श करते हैं
क्या वे चाहते हैं
खोजना

कि
औरत को देह बनाने में जुटते हैं
क्या वे जानते नहीं
कि
पल रही है सृष्टि
उसी कि कोख में

कि उसके स्तन सींचते हैं प्राण
कि वह जब करती है प्यार
तो देखती
नहीं है
आगे पीछे
और होती है
सर्वहारा सी

और उसी कि देह पर
होता है विमर्श
क्या है उसकी देह
कि
जब तनती है
तो हों जाती है आकाश

और जब भीगती है
तो जैसे धरती
देती है तो ईश्वर सी
और मांगती है क्या !
वे थाह नहीं पाते हैं
और करने लगते हैं
विमर्श

लिखने लगते हैं शब्द
उसी देह पर

और पढ़ने लगते हैं देह बार बार
और फिर करते हैं
विमर्श!! विमर्श!! विमर्श !! और सिर्फ विमर्श !!



मंगलवार, 8 सितंबर 2009



फाड़ दिया
तुम्हारा ख़त

कई टुकडे बन गए इबादत के
पढ़ते हुए
तुम्हारा ख़त

याद आई जाति बिरादरी
याद आया चूल्हा
छूत के डर से
छिपा एक कोने में
!

याद आई बाबा की
पीली जनेऊ

खींचती रेखा कलेजे में !
तुम्हारा ख़त पढ़ते हुए
याद आई
सिवान की थान
जहाँ जलता
पहला दिया हमारे ही घर से
!
याद आई झोपडी
तुम्हारी
जहाँ छीलते थे पिता
तुम्हारे
बांस
और बनाते थे खाली टोकरी !
याद

आया हमारा
भरा खेत खलिहान
!
तुम्हारा ख़त पढ़ते हुए
घनी हों गई छांव नीम की
और
याद आई
गांव की बहती नदी

जिसमें डुबाये बैठते
हम

अपने अपने पाँव
!
और बहता
एक रंग पानी का!
फाड़ दिया
तुम्हारा ख़त

कई टुकडे बन गए
इबादत के
और इबादत के कई टुकडे हुए!

मंगलवार, 18 अगस्त 2009



उस पार जिया है मेरा
और बीच में सागर पूरा
किस तरह तुम्हें समझाऊं
की मिलना रहा अधूरा
कोई कश्ती नहीं किनारे
कोई भी साथ नहीं रे .
वो दूर देश जा बैठे
दे गीली आँखें क्यों रे
मैं कैसे ये संदेसा लहरों पे लिखती जाऊं
इस पार किनारे पर हूँ
उस पार कहाँ से आऊँ
वे प्रियतम मेरे मन के
मेरी साँसों के तन के
क्यों लग कर मेरे अंग से
मुझको तट तक ले पहुंचे
नीला सागर दिखलाकर
थपका कर गीत सुनाकर
मेरे होंठों से मोती चुग कर
कहाँ गए रे
मेरे गालों पर उनके
चुम्बन के दाग पड़े हैं
मेरी आँखें ढूँढ़ रहीं हैं
सागर के पार किनारे
की शायद कोई कश्ती आकर के लगे वहां रे
और प्रियतम मेरे मन के फिर कस लें उसी तड़प से
मैं लहर लहर जीती हूँ
पूरा सागर पीती हूँ
तुम कश्ती बनकर आना
ले चलना मुझे किनारे
तब मैं सागर में खोकर
सिकता से मोती होकर
खो जाउंगी तुममें ही
प्रियतम
तुम सी ही धोकर

सोमवार, 27 जुलाई 2009

तुम चाहते हो
अकेली मिलूं मैं तुम्हें
पर अकेली नहीं मैं
मेरे पास है
मेरी ज्वालाओं की आग
तमाम वर्जनाओं का पूरा अतीत ।
जबसे ये जंगल हैं
तबसे ही मैं हूँ ढोती
नई सलीबें!
मैंने उफ़ नहीं की
मगर बनाती गई
आग के कुँए अपने वजूद में
तुमने जाना की मौन हूँ
तो
हूँ मैं मधुर!
मगर मैं तो मजबूत करती रही रीढ़
कि
करुँगी मुकाबला एक दिन
रतजगों ने दी
जो तपिश उसको ढाला
मैंने कवच में
उसी को पहन आउंगी तुमसे मिलने.
अकेली नहीं मैं .

सोमवार, 29 जून 2009

औरतें तलाशती हैं
छत ,छाजन।
आँचल गीत
खोजती हैं
आकाश थोडी धूप
हकबकायी औरतें
ढूंढ रहीं हैं
दौरी सूप
वे खोजतीं हैं आग
उन्हें पकानी है रसोईं
पतझड़ हो गई
औरतें
स्तनों के बीच
तलाशती
बच्चे
पूछती हैं
आतंकियों से
कहाँ मिलेंगे अब
कोनें जिनमें छुपती
थीं वे मार खाकर

गुरुवार, 11 जून 2009

मेरे घर में आती है
खुली खिड़की से हवा
आताहै आसमान भी पूरा पूरा वहीँ से
आती है उदासी उसी खिड़की से
रहता है पूरा घर जैसे वहीँ पर
वह खिड़की वजूद है मेरे होने का
करती है बात कबसे
इसी खिड़की से ढलती है शाम
रात चुप चाप दाखिल होती है यहीं से
सपनों का नींद में आना है यहीं से
यहीं से झांकती हैं तन्हाईयाँ
जाने के बाद
लगती है बच्चे को सायकिल सी ज़रूरी
सू खी डालें बरसातें
महक ज़मीं सितारें चाँद
सागर भरकर नावें
, बादल जाने कितनी शक्लोंवाले
झाँक कर झाँक कर जाते
जैसे छेड़े कोई नई उम्रे की किसी लजीली कों
दरवाजों ने कई बार है टोका इसको
बंद करो ये ताका झांकी
टोका टोकी
मगर ये खिड़की उड़ती जाती दूर फलक तक
क्षितिज से सारी खबरें लाती उछल उछल कर
फुर्सत में समय के कोने से
दरवाज़ा हौले दस्तक से खुलवाकर
पूछ ही लेती है खिड़की
दरवाजों से भी हाल चाल।

बुधवार, 10 जून 2009

सुख और दुःख तो बातें हैं
महसूस करने की.. ...पूरी ज़िन्दगी ही दर्द में लिपटी कविता है...क्यों न खूब जिया जाए इस कविता को और खूब पिया जाए iजीवन को .... !!

शुक्रवार, 15 मई 2009

याद आती है बचपन की बारिश
जब लरज उठती थी
बँसवारी हरहराती बूंदों से
और सागौन के पत्तों से फिसलता पानी
बेसब्र होकर चूमता था ज़मीं
मैं झूठे के काम बहाने पार करती थी आँगन
बिना बताये किसे भी
भीगती थी छत पर
रात जब आती थी घटा टॉप होता था
बिजली जब कौंधती थी मै दम साध लेती थी
और खोजती थी आकाश बिजली की कौंध में
आज वही बारिश है पर नहीं लरजती है बँसवारी
मै पार नहीं करती आँगन भीगने के डर से
सागौन के पत्तों से जाने कब फिसल जाता है पानी
भूल सी गई है छत
घटा टॉप दिखाई देता है आसमान
और उसपर बिजली जब कौंधती है मै दम साध लेती हूँ की होगा क्या अब आगे
नहीं खोज पाती थोडा सा आसमान अपने लिए

सोमवार, 11 मई 2009

मन होता है की कितना कुछ कह जाएँ खुद से
अपने से बहुत सी बातें करनी होती हैं
वे बातें जिन्हें हम किसी तक पहुंचा नहीं पाते
वे बाते जिन्हें हम हर वक़्त खुद में जीते हैं
। कुछ लोग जो हमारे चेहरों के आस पास होते हैं
हमारे चेहरों में अपने चेहरे छोड़ जाते हैं
जबकि उनसे हमारा कोई नाता नहीं होता हमारे स्पर्शों में अपने स्पर्श छोड़ जाते हैं
कहीं न कही . वे लोग जो अपने मैले से आवरण में होकर भी हम पर सीधा वार
करते हैं ।
भले ही हम न माने की हम चोटिल हुए हैं उनके वार से ।
भले ही हम पहन लें धुले कपडे इस्तरी किये हुए
हम शर्मिंदा हैं कहीं न कहीँ

. . तभी ये होता है की
हमें आइना देखना पड़ता है बार बार .
हम बार बार ठीक करते हैं अपना चेहरा लेकिन वह ठीक नहीं होता है.
हम छुपाते हैं खुद को खुद से ही.
खुद से दूर जाने के लिए छुपाते हैं भीड़ में .
हम अपराधी हैं तमाम अपराधों के।
भले ही हमने न किये हों वे अपराध
मगर हम उनमें शामिल हैं कहीं न कहीं ।!!!!

बुधवार, 6 मई 2009

आप सब लोगों ने मेरी कविता को पसंद किया और अपनी टिपण्णी लिखी इसके लिए धन्यवाद. भविष्य में भी इसी तरह मेरा ब्लॉग पढ़ केर टिपण्णी करते रहें ।dhanyawad

सोमवार, 4 मई 2009

यह सिन्दौरा मेरा है .
मैं इसी के साथ यहाँ आई थी
कहा गया था की बहुत संभालना है इसे मुझे
सिर से लगाकर ही पीना है पानी
और फिर छूने हैं सबके चरण
य भी कहा की दीवारों के भीतर तक है मेरा घर
कहते थे की अब मैं बड़ी हूँ और जिम्मेदार भी
मैं भी रखती थी सिन्दौरा बक्से में और लगाती थी एक ताला उसमें
लेकिन अचानक कल कुछ हुआ
एक मेरे गौरेया आँगन में आई
और मेरी पलकों पर सोये गीत ले भागी
मैं भागी उसके पीछे और भूल आई ताला वहीँ पर
अब बक्सा खुला है .
कोई क्या चुराएगा ! क्या मेरा सिन्दौरा ?
अगर चुरा भी ले गया
तो क्या ले जायेगा
!
मैं अपने गीत वापस मांग लाइ हूँ उस गौरेया से !!

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

चलते समय जब ढंका था मेरा चेहरा तब मैं अपने पांव देख रही थी और देख रही थी वह ज़मीं जिस पर मेरे पांव थे तब मुझे लगा था की यह ज़मीं तो अपनी ही है दो पग की क्यों न मैं ले आऊँ पूरा आकाश वहीँ पर कुछ नहीं तो कोशिश करूँ गिर भी तो गिरूंगी अपनी ज़मीं पैर

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

ठंढ में हाथ सेंकने जैसा है औरत पर बात करना
जलती लकडियाँ बुझीं तोह नहीं ये देखना है बस।
वो यूँ की चूल्हा जलाता रहे ,सब सुलगता रहे
पतीला धीरे धीरे गरम होता रहे
और सारी बात केवल इस बात तक रहे की
बाहर कुछ भी उफनने पाए भीतर चाहे जितना
जलता रहे.