शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

निरपराध लोग

कुछ  लोग जब रचने  में लगे हैं 
कविता
करने में जुटे हैं प्रेम .

 मारे  गए
 
शस्त्रयुक्त
 बिखरने के लिए 
  प्रतिबद्ध
निरपराध लोग  !
जब
आज  लोग  उठाते हैं 
 अभिव्यक्तियों   के खतरे
.और उन खतरों पर होती है बहस!
 मारे गए कुछ लोगों की 

 अभिव्यक्तियां
कर गयीं हैं  काठ!
चुप 
क्यों है बहस !!
जो  मारे  गए वे
थे कौन 
क्यों  मर  गए ?
कौन सा जिला 

कौन सा देश
 कौन सा गावं था उनका !
कौन सा बचपन !

थे कौन से   स्वप्न  !
क्या   पूछा उन्होंने  या
  कि बताया
 कि कैसे गिरगिट
 चढ़ आया था कान तक
!
क्या
 कभी
पूछा उन्होंने
 ये प्रश्न संसद से
   सरकार क्यों  चैन से  सोती है
सुरक्षित बेदाग़  बेहिसाब ! !
 है  समर्थ  जो

 सहर्ष करती है  फैसले .
जीने मरने वालों पर

 सम भाव से !
 या क्या कभी पूछा हमने !!
   

28 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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  2. बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

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  3. pata nahi ye soorat kab badlegi...kavi to bas shringaar me hi reh gaye...

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  4. वस्तु स्थिति पर व्यंग्यात्मक रुख भरी भाव विह्वल अभिव्यक्ति !प्रश्नाकुलता की बेचैन प्रस्तुती !

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  5. निरपराध की फिर से जान न जाए इस पर सोचना होगा ....विद्रोह को खूनी होने से बचाना होगा....,संसद तो गूँगी और बहरी हो चुकी है पहले ही .

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  6. sansad kabtak maun rahegi? iska maun kaun todega? hamare desh mein apradhi kabtak befikra ghoomate rahenge? nyay apne andhepan ko chhodkar sachet kab hoga? satta par kabtak anadhikrit taqten kabja kiye rahengi? kya yah ab sach nahin lagne laga ki desh ko bachane ke kasmen khane wale use lootne mein lage hain? kya ab is par vishvas nahin hone laga ki bhrastachar se bas vahi mukt hai jiske pass bhrasht hone ka mauka nahin hai? desh ka charitra nirdosh nahin raha.
    main nirashavadi nahin hoon magar aasha ki kiran bhi to kaheen dikhayee nahin de rahi.kavita achhi hai aur samajh mein aati hai.
    krishnabihari

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  7. झंझोड़ कर रख देने वाली रचना ... आक्रोश और संवेदना की गहरी अनुभूति के बाद ही ऐसी रचनाएँ जन्म लेती हैं ....
    सच है कोई चर्चा नही होती इनके बलिदान की ... क्या वो खून पानी था ... या उनके सपने नही थे जो मर गये ... निःशब्द हूँ इस रचना पर ......

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  8. रचना ने सोचने पर मजबूर किया. मन पहले ही उदास था रचना पढ़ कर पीड़ा और घनी हुई. मारे गए लोगों के प्रति श्रद्धांजलि क्यों की और कुछ कर पाने की फ़िलहाल सामर्थ्य नहीं है.शब्द मौन हैं.

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  9. जब आज लोग उठाते हैं
    अभिव्यक्तियों के खतरे
    .और उन खतरों पर होती है बहस!...

    बिलकुल सही कहा आपने... अभिव्यक्क्तियों के खतरे भी होते हैं.... और फिर उन खतरों पर बहस भी.. व्यवस्था पर व्यंग अच्छा किया आपने.... बहुत सुंदर और बेहतरीन प्रस्तुति....

    --
    www.lekhnee.blogspot.com


    Regards...


    Mahfooz..

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  10. आप सब लोगो का इतना प्यार और इतना प्रोत्साहन देख कर मन विह्वल हों गया है . निश्चय ही आगे और बेहतर लिखने का प्रयास करेंगे !आप सभी को दिल से शुक्रिया !

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  11. bahut hi behtareen prastuti....
    itni achhi rachna ke liye badhai....
    mere blog par is baar..
    वो लम्हें जो शायद हमें याद न हों......
    jaroor aayein...

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  12. जब आज लोग उठाते हैं
    अभिव्यक्तियों के खतरे
    .और उन खतरों पर होती है बहस!...

    bahut kamaal ki abhivayakti hai .....

    bahut achcha laga aapko padhna

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  13. कविता संवेदनहीनो को तिर्वस्त्र करती है .।

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  14. सचमुच रोंगटे खड़े हो गये इस रचना को पढ़कर । जो खतरे उठायेंगे वो मारे जायेंगे ..मुक्तिबोध के शब्दों में कहूँ तो अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे ।

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  15. bahut sahi likha hai apne. kabhi fursat mile to hame bhi padna at http://1minuteplease.blogspot.com

    Aabhar sahit
    Anand Mehra

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  16. गरीबो की आवाज उठाने का भरोसा दिया औऱ परिवार के इकलौते कमाने वाले के सीने में गोली उतार दी.....यही है दंत्तेवाड़ा का सच...

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  17. जब आज लोग उठाते हैं
    अभिव्यक्तियों के खतरे
    .और उन खतरों पर होती है बहस!...


    बहुत गहरी बात , निकलकर आती है ,
    इन पंक्तियों से .......बहुत अच्छा लगा पढकर ...
    शुक्रिया ........

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  18. prgya ji bahut gambhir rachna... bilkul laghupatrika ke tewar wali... aise hi kavitaon se hindi blogging gambhir hogi... khas taur se jab aadha desh apradh, visthapan, narsanhar ke timir me fansa ho.. aapki kavita ke maayne badh jaae hain... udwelit karti rachna...

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  19. कमाल की पंक्तियाँ और भाव है ! संवेदनशील रचना!

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  20. Tamaam baadhaaon ke baawazood khatre uthaane waaley uthaate hain. Lekin bad-kismati se inka saath dene waaley kam hain. Sarkaaren aaraam me hain aur afsar maje me.

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  21. prgya di .,aapne aapni kavitke dwara bahut hi samvedansheel baat kahi hai.bahutbahut achha laga padh kar.
    aapke v ushh di ke baare me purnima di se kaafi baat hui thi unhone aap dono se baat karne ke liye bhi kaha tha.par durbhagyavash mai aap logo se apni aswasthta ke karan pritimadam ke yaha jo blogers meeting hui thi usme na pahunch kar nahi milpaae.jiskka mujhe behad afsos hai.khair ab e-mail ke jariye hi baatcheet hogi.dhanyvaad
    poonam

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  22. sochne pr mjboor kregi, bar bar kregi.jb aise hi jbrdst rchnaye bar bar samne aayegi .
    aajkl ke mahoul me aisi jhkjhorne wali vichardharao ki skht jrurt hai .

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  23. 'सरकार क्यों चैन से सोती है
    सुरक्षित बेदाग़ बेहिसाब ! !'
    - क्योंकि सरकार अंधी बहरी है.

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