सोमवार, 11 मई 2009

मन होता है की कितना कुछ कह जाएँ खुद से
अपने से बहुत सी बातें करनी होती हैं
वे बातें जिन्हें हम किसी तक पहुंचा नहीं पाते
वे बाते जिन्हें हम हर वक़्त खुद में जीते हैं
। कुछ लोग जो हमारे चेहरों के आस पास होते हैं
हमारे चेहरों में अपने चेहरे छोड़ जाते हैं
जबकि उनसे हमारा कोई नाता नहीं होता हमारे स्पर्शों में अपने स्पर्श छोड़ जाते हैं
कहीं न कही . वे लोग जो अपने मैले से आवरण में होकर भी हम पर सीधा वार
करते हैं ।
भले ही हम न माने की हम चोटिल हुए हैं उनके वार से ।
भले ही हम पहन लें धुले कपडे इस्तरी किये हुए
हम शर्मिंदा हैं कहीं न कहीँ

. . तभी ये होता है की
हमें आइना देखना पड़ता है बार बार .
हम बार बार ठीक करते हैं अपना चेहरा लेकिन वह ठीक नहीं होता है.
हम छुपाते हैं खुद को खुद से ही.
खुद से दूर जाने के लिए छुपाते हैं भीड़ में .
हम अपराधी हैं तमाम अपराधों के।
भले ही हमने न किये हों वे अपराध
मगर हम उनमें शामिल हैं कहीं न कहीं ।!!!!

4 टिप्‍पणियां:

  1. kuch sparsh aise hote hain jinki mahak hum kabhi nahin bhool pate....
    ACHHI BAAT K LIYE ACHHI BADHAI

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  2. हमे आईना देखना पड़ता है बार ,बार क्योंकी ----
    आईने के सौ टुकड़े कर के हमने देखे है ,
    एक में अकेले थे , सौ में भी अकेले हैं ।
    ये तो गीत है ,गाते रहीये ,
    शुभ कामनाये

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  3. bahut achchi bat likhne ke liye badhai.aapki kavita mai sachai ki mahak hai.

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  4. BAHUT KHUB! IS SE MILTI-JULTI-SI EK APNI GHAZAL YAAD AA GAYI, LINK SAMET YAHAn CHEP RAHA HUn :-
    ताज़ा कौन क़िताबें निकलीं
    उतरी हुई ज़ुराबें निकलीं

    शोहरत के संदूक में अकसर
    चोरी की पोशाकें निकलीं


    संबंधों का कलफ लगा कर
    सीना तान उम्मीदें निकलीं


    मैले जिस्म घरों के अंदर
    बाहर धुली कमीज़ें निकलीं


    दुनिया को सच्चाई बताने
    चेहरे ओढ़, नक़ाबें निकलीं


    चेहरे कितने चमकदार थे
    कितनी घटिया बातें निकलीं


    पानी का भी जी भर आया
    यूँ बेजान शराबें निकलीं
    -संजय ग्रोवर
    (http://www.samwaadghar.blogspot.com/2009/03/blog-post/_04.html)

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