शुक्रवार, 15 मई 2009

याद आती है बचपन की बारिश
जब लरज उठती थी
बँसवारी हरहराती बूंदों से
और सागौन के पत्तों से फिसलता पानी
बेसब्र होकर चूमता था ज़मीं
मैं झूठे के काम बहाने पार करती थी आँगन
बिना बताये किसे भी
भीगती थी छत पर
रात जब आती थी घटा टॉप होता था
बिजली जब कौंधती थी मै दम साध लेती थी
और खोजती थी आकाश बिजली की कौंध में
आज वही बारिश है पर नहीं लरजती है बँसवारी
मै पार नहीं करती आँगन भीगने के डर से
सागौन के पत्तों से जाने कब फिसल जाता है पानी
भूल सी गई है छत
घटा टॉप दिखाई देता है आसमान
और उसपर बिजली जब कौंधती है मै दम साध लेती हूँ की होगा क्या अब आगे
नहीं खोज पाती थोडा सा आसमान अपने लिए

12 टिप्‍पणियां:

  1. बचपन में ज़िन्दगी समझ में नहीं आती है. समय बदलता है तो बहूत कुछ बदलता है मधुकर जी .ब्लॉग देखने का शुक्रिया

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  2. -मै दम साध लेती हूँ ,
    की क्या होगा अब आगे ,
    और धीरे -धीरे हम खो देते हैं
    [ अपना आकाश ]
    नही हम ढूंढ़ लायेगे ।
    मर्म छू लिया आपने --बधाई ।

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  3. shabdon ka chayan aapke lekhani me bahot hi khubsurati se hota hai.... ye baat achee lagti hai aapki kavitawon me.... jaari rakhen...


    arsh

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  4. bahut badyia.bachpan ki yaadain to baarish ke bina adhuri hai.baarish mai khelna yaad agya.miracle par dastak dene ke liye dhanawad.

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  5. मैं झूठे के काम बहाने पार करती थी आँगन
    बिना बताये किसे भी
    भीगती थी छत पर

    कितना बड़ा था आसमान तब.......कितना सच्चा था झूठ तब !

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  6. बहुत ही खूबसूरती से आपने बचपन को महसूस करा दिया.....
    सुन्दर रचना.......

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  7. bahut hi khoobsoorat kavita hai mam . bachpan se khoobsoorat aur kuch nahi .

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  8. chaliswe sawan ko solhwen sawan ki bauchharo se
    bhigo di pragyaji bhut sunder.
    mukta usha,sis in law

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