गुरुवार, 24 सितंबर 2009



क्या है औरत की देह
कि
वे देह विमर्श करते हैं
क्या वे चाहते हैं
खोजना

कि
औरत को देह बनाने में जुटते हैं
क्या वे जानते नहीं
कि
पल रही है सृष्टि
उसी कि कोख में

कि उसके स्तन सींचते हैं प्राण
कि वह जब करती है प्यार
तो देखती
नहीं है
आगे पीछे
और होती है
सर्वहारा सी

और उसी कि देह पर
होता है विमर्श
क्या है उसकी देह
कि
जब तनती है
तो हों जाती है आकाश

और जब भीगती है
तो जैसे धरती
देती है तो ईश्वर सी
और मांगती है क्या !
वे थाह नहीं पाते हैं
और करने लगते हैं
विमर्श

लिखने लगते हैं शब्द
उसी देह पर

और पढ़ने लगते हैं देह बार बार
और फिर करते हैं
विमर्श!! विमर्श!! विमर्श !! और सिर्फ विमर्श !!



24 टिप्‍पणियां:

  1. याद है मुझे बस
    संदल का भभका
    और उसके चेहरे की मुस्कान ,
    विमर्श ......विमर्श .......विमर्श.

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  2. कविता देह- विमर्श पर वाजिब सवाल खड़े करती है.दायरा मूलतः समाजशास्त्रीय है पर कुछ पंक्तियों में काफी लालित्य भाव से काव्यात्मक ग्लोरिफिकेशन किया गया है, जैसे----
    "जब तनती है
    तो हों जाती है आकाश
    और जब भीगती है
    तो जैसे धरती
    देती है तो ईश्वर सी"
    सपाट प्रश्न के साथ खड़ी कविता में ये पंक्तियाँ कविता में सौन्दर्य का आयाम भी जोड़ देती हैं.

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  3. औरत क्या है जब ये सोचता हू तो
    तो यही सोच दिमाग मे़ आती है -
    औरत क्या नही है, औरत धरती है
    औरत एक बच्चे का आसमान है
    औरत एक समाज की धुरी है
    औरत एक सभ्यता का जीवित स़स्कार है
    औरत मा की ममता है, आन्चल का दूध है
    बिना वाप के बच्चो़ का पिता भी है
    औरत गुरु है, ग्यान है, गरिमा है
    औरत बेटी है, रन्गोली है, आन्गन की तुलसी है
    औरत से घर मे़ मनते सब त्योहार है
    औरत गीत है कविता है गज़ल है
    औरत मानवता की किताब के पन्नो पे
    लिखा एक सुनहरा ललित निबन्ध है
    औरत हा औरत ही वो अद्भुत शक्ति है
    जो एक शरीर से कई शरीर बना सकती है
    भगवान ने कुल एक औरत पैदा की
    वो औरत है जिसने कई भगवानो और
    अनगिन भाग्यवानो को जन्म दिया
    दुनिया मे औरत पे उन्गली उठाने बालो
    औरत है तो ये दुनिया है उसके बिना
    आदमी तो क्या आदमी का जीवास्म नही होता
    औरत के जिस्म को देख के विमर्श करने बालो
    औरत को देखना है तो दुर्गा के अवतारो को देखो

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  4. जब तनती है
    तो हों जाती है आकाश
    और जब भीगती है
    तो जैसे धरती
    पर उस आकाश पर थूकने वाले भी मिलेंगे और फिर धरती का क्या हाल कर दिया है !!
    बहुत खूबसूरत रचना

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  5. गंभीर कविता
    पढ़ कर कुछ विचार उमड़े, कुछ आँख खुली ....

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  6. जब भीगती है
    तो जैसे धरती
    देती है तो ईश्वर सी
    और मांगती है क्या .......

    नारी मन को साक्षात शब्दों में उतारा है आपने ............ बहूत ही कमाल का लिखा है ........ शब्द सीधे उतारते हैं मन के अन्दर ....... लाजवाब .... मोन हूँ इस रचना पर .......

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  7. तो देखती नहीं है
    आगे पीछे
    और होती है
    सर्वहारा सी .........
    कितना दुर्दांत बयान दिया है तमने ! बधाई स्वीकार करो !
    मेरे कंठ को आवाज दी ! और कलेजे को ठंढक !
    सर्व हाराओं की पीडा को समाज कब समझेगा ? कब ? कब ?

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  8. बहुत गहरी बात कही है आपने
    गन्दी नज़र वाले लोगों के मुंह पर तमाचा है

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  9. जब तनती है
    तो हों जाती है आकाश
    और जब भीगती है
    तो जैसे धरती
    देती है तो ईश्वर सी
    और मांगती है क्या !
    वे थाह नहीं पाते हैं
    और करने लगते हैं
    विमर्श
    लिखने लगते हैं शब्द
    उसी देह पर
    और पढ़ने लगते हैं देह बार बार
    और फिर करते हैं
    विमर्श!! विमर्श!! विमर्श !! और सिर्फ विमर्श !!

    wah! yeh poori lines bahut achchi lagin.....

    bahut gahrre bhaav diye hain aapne ismein....

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  10. वे देह विमर्श करते हैं
    क्या वे चाहते हैं
    खोजना
    कि
    औरत को देह बनाने में जुटते हैं
    wah
    pragya
    bahut hi sunder
    v sahsik bayan hai
    sidhe saral sabdon mein sampreshit hota
    aadmi ka sankuchit vyavhaar
    aurat ko deh samajne ki bhul per prahar kerti ye kavita ...apne vishay ke kshetra mein ek unchavisisth sthan rekhegi...wah

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  11. इतनी तारीफ करके अज्ञात बने रहना . शुक्रुया देने के लिए कोई पता तो बताईए .. जो भी हों आपको इतने उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद.

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  12. wah
    pragya ji
    bahut hi sunder
    इंसान दुनिया में आता है और चला जाता है

    लेकिन वह जाने के लिया आता है और आने के लिया जाता है

    वह रोता हुआ आता है और रोता हुआ जाता है

    पर क्या कभी सोचा है आपने सबसे ज्यादा वह किसे सताता है

    देती है जो जन्म उसे और इस दुनिया में लाती है

    ख़ुद तो जगती है रातों को, लोरी गा उसे सुलाती है

    वह तो भूखी रहती है लेकिन बच्चे को दूध पिलाती है

    खिला-पिला कर बड़ा करे और उसको खूब पढाती है

    और यह सब करने में वह ख़ुद को भूल जाती है

    आंखों में सपने होते हैं, दिल में होते हैं अरमान

    इसीलिए वह अपनी सारी खुशिया कर देती है दान

    दान में खुशिया दे देती है ले लेती है सारे गम

    होती है ममता उसकी नहीं किसी से कम

    इस सबके बदले में बेटा देता है क्या माँ को

    यही समझना है हम सबको, यही सोचना है हम सबको।

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  13. shabdo evam bhavo ka bahut hi khoobsoorat sangam hai aapki rachna mein...Ek sachchai ko behad sangitmayee prastutii dii hai aapne...badhaii.

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  14. didi ji aapne itna accha likha hai ki man ho raha hai ki baar baar aur baar - baar padhta rahooo.

    didi ji aapko bahut bahut badhai....

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  15. पढ्कर लगा जैसे शब्द किसी स्त्री देह पर ही बैठ्कर विमर्श कर रहे होँ...
    "वह पहाड मे दरवाजे बना सकती है और हर दरवाजे से पूरा पहाड गुजार सकती है"

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  16. विमर्श
    लिखने लगते हैं शब्द
    उसी देह पर
    और पढ़ने लगते हैं देह बार बार
    और फिर करते हैं
    विमर्श!! विमर्श!! विमर्श !! और सिर्फ विमर्श !!

    निःशब्द हूँ आपकी इस रचना पर .......!!

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  17. और पढ़ने लगते हैं देह बार बार
    और फिर करते हैं
    विमर्श!! विमर्श!! विमर्श !! और सिर्फ विमर्श !!
    ...Ek sach, jo sirf vimarsh ban gaya..!!

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  18. औरत.... क्या है औरत?
    जन्म के समय जिसे न वो प्यार मिले,
    जिसे दो वक़्त कि रोटी भी उधर मिले,
    जो भाइयो के लिए अपनी पढाई का त्याग करे,
    माँ-बाप के वात्सल्य का जो इन्तेजार करे... वही है औरत

    जिसकी उम्र के साथ लोगों कि निगाहें बढ़ने लगे
    हर चौक से गुजरने में जिसे डर लगने लगे
    हर अजनबी को देख जिसकी धड़कने बढ़ने लगे
    जो घर में भी सुरक्षित न महसूस करे... वही है औरत

    जिसे पेट भरने कि खातिर अपनी देह बेचनी पड़े
    जिसे हर बात पर पुरुषों के जुल्म सहने पड़े
    जिसे सबके साथ भी अकेले रहना पड़े
    जो कभी अपना दुःख किसी से न कह सके... वही है औरत

    और आज की औरत पर एक नजर....
    जिसके १०-१२ प्रेमी हो और उसके नखरे सहे
    जिसके शादी के बाद भी एक दो प्रेम-सम्बन्ध रहे
    जिसकी हर बेजरूरत चीजों के लिए उसका पिता फिर पति सहे
    जो किटी पार्टी में बैठ ससुराल की बुराई करे
    जिसे बच्चे बिगड़ रहे है इसका ध्यान न रहे
    जिसे घर कि किन्ही बातों का ज्ञान न रहे... वो भी है औरत...

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  19. गंभीर कविता
    विमर्श
    लिखने लगते हैं शब्द

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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