शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

हाँ मैं हूँ जंगली
मुझे नहीं आती
तुम्हारी बोली भाषा आभिजात्य
ओढ़ कर तुम्हारी हंसी का लबादा
नहीं लुटा सकती अपनी

अस्मिता अपने संस्कार !
मुझमें नहीं
इतनी ताक़त
कि पी जाऊं अपनी अस्मिता
और
परोसूं अपना वजूद !
हाँ मैं हूँ जंगली ..
नहीं जानती कि मुझमें है
ऐसा सौंदर्य
कि
सभ्यताएं पहन
तुम होते हों वहशी !
मगर मुझे आता है क्रोध
तुम्हारी संस्कृति पर!
मुझे आता है क्रोध
जब परम्पराओं की
चाशनी में लपेट तुम
शुरू करते हों
मुझको परोसना
हाँ मै हूँ जंगली
नहीं जानती
सभ्यता
पर इतना जानती हूँ कि
तुम शोषक हों
और मै हूँ शोषिता
हाँ मै हूँ जंगली
नहीं जानती सभ्यता!

23 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसा सौंदर्य
    कि
    सभ्यताएं पहन
    तुम होते हों वहशी !

    is pankti ne man moh liya....


    vyatha ko bahut achche se describe kiya hai aapne.....

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  2. बहुत ही अच्छी कविता......

    मर्मस्पर्शी कविता

    सन्देश पूर्ण कविता

    _अभिनन्दन !

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  3. पर इतना जानती हूँ कि
    तुम शोषक हों
    और मै हूँ शोषिता
    हाँ मै हूँ जंगली
    नहीं जानती सभ्यता!nice

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  4. यह अच्छी कविता है प्रज्ञा ।चलिये समकालीन कविता लिखने वालों में व्रद्धि तो हो रही है । आपने मेरे ब्लॉग "शरद कोकास " पर कात्यायनी की कविता पढी?

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  5. कथित सभ्य समाज के शोषक रूप को व्यक्त करती अच्छी कविता.
    मुख्य धारा में लाने के नाम पर उन्हें अपनी ही धारा से काटने का खेल चलता रहा है.उस दुनिया की स्त्री के वाजिब सवाल उठाती है कविता.

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  6. सभ्यताएं पहन
    तुम होते हों वहशी !
    मगर मुझे आता है क्रोध
    तुम्हारी संस्कृति पर!
    मुझे आता है क्रोध
    जब परम्पराओं की
    चाशनी में लपेट तुम
    शुरू करते हों
    मुझको परोसना!!!!!!!!!!!!!
    स्त्री का सहज रूप जंगली ही कहलाता है !
    सभ्यता संस्कृति संस्कार परम्परा में स्त्री
    का सहज रूप कहीं खो गया है ! अच्छा
    हुआ याद दिला दिया प्रज्ञा !!!!!!!!!!!!!!!!!!!
    धन्यवाद ! शुभकामनायें !

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  7. उषा तुमने इतने जंगलीपन से हमें जंगली न कहा होता ये कविता रची न गयी होती .. तुम्हीं को समर्पित

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  8. पोलीश्ड कल्चर को उघाड़ती कविता

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  9. कविता अच्छी लगी, आप अच्छा लिखती हैं, *अभिनंदन*

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  10. हाँ मै हूँ जंगली
    नहीं जानती
    सभ्यता
    पर इतना जानती हूँ कि
    तुम शोषक हों
    और मै हूँ शोषिता ...

    AAPKI RACHNA MEIN MAARMIKTA KE SAATH SAATH EK AAKROSH BHI HAI JO BELAGAAM PURUSH SATTA KA MAZAAK BHI UDAATA HAI AUR USKA GHINONA ROOP BHI DIKHATA HAI .....
    BAHOOT HI SAARTHAK RACHNA HAI ....

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  11. बहुत अच्छा लिखती हैं आप प्रज्ञा. कथ्य और मर्म दोनो मर्मस्पर्शी लगे.

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  12. अगर यही जंगली होना है तो इसे बचाया जाना चाहिए। प्रतिरोध की हर आवाज के सुर में सुर मिलाना हमारा काम है।

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  13. हाँ मैं हूँ जंगली मुझे नहीं आती
    तुम्हारी बोली
    नहीं जानती
    तुम्हारी भाषा
    उतनी आभिजात्य नहीं
    कि
    ओढ़ कर लबादा
    तुम्हारी हंसी का
    बांटती रहूँ अपने सस्कार !
    मुझमें नहीं
    इतनी ताक़त
    कि पी जाऊं अपनी अस्मिता

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  14. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  15. आप तो गजब की कविताएँ लिखती हैं. मैंने पहली बार आपका ब्लॉग देख.

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  16. 1.
    नहीं प्रज्ञा दिल रखनी बातें मुझे नहीं आती .. बिना टिपण्णी के निकल सकता था लेकिन.. इस रचना में एक आवेश है एक जबरदस्त पञ्च है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती
    इसे कसो तब बात बनेगी .. मुझे भी किसी ने ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया था ..
    पहला पैरा ठीक करने का प्रयास करूंगा शेष आप करना

    हाँ मैं हूँ जंगली
    मुझे नहीं आती
    तुम्हारी बोली भाषा आभिजात्य
    ओढ़ कर तुम्हारी हंसी का लबादा
    नहीं लुटा सकती अपनी अस्मिता अपने संस्कार

    JAHAN MUSHKIL LAGE POOCHHNE MEIN SANKOCH NA KARNA..
    2.
    upar tipaniyon ki takrar pad kar galib yad aaye " kuchh na samjhe khuda kare koi"

    3.
    DUSHMANI JAM KE KARO PAR YE GUNJAISH RAHE
    KI KBHI DOST BANEIN TO SHARMINDA NA HON
    4.
    YEH BLOGS KA MANCH SEEKHNE SIKHANE KE LIYE THE BEST HAI WHY SHOULD'NT WE MAKE TH BEST USE OF IT ?
    5.
    EK FILM MEIN DIALOG THA "KRODH KO PALNA SEEKHO"
    KAVITA SE BEHTAR KOI PALNA NAHIN HAI KRODH KE LIYE .. YA KISI BHI OORJA SE BHRE BHAW KE LIYE

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  17. मन विचलित हो गया आपकी कविता पढ़ कर.जंगली तो हम है....मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

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  18. प्रकृति को दखो कितनी अनगढ़ दिखती है.. जंगली! ऐसा लगता है जैसे सब अव्यवस्थित है फिर भी कितनी सुन्दर क्यों ?
    क्योंकि इस घनघोर अव्यवस्था में कहीं भीतर बहुत ही सूक्षम स्तरों पर सदा ही एक व्यवस्था कार्यरत रहती है अक्षुण भावः से कार्य करती हुई यहीव्यवस्था सौन्दर्य की सर्जक है ... कविता भी कुछ ऐसे ही होती है अपनी अनगढ़ता में पता नहीं क्या क्या गढ़ती हुई ...

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  19. बहुत गहराई से लिखती हैं आप शब्दों मे डूबकर
    अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर....
    जिस तरहां से आपने सभी पहलुओं को लेकर इस समाज मै होने सभी बुराइयों पर कटाक्ष किया है वो बहुत ही अच्छा लगा


    माफ़ी चाहूंगा स्वास्थ्य ठीक ना रहने के कारण काफी समय से आपसे अलग रहा

    अक्षय-मन "मन दर्पण" से

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  20. धन्यवाद प्रज्ञा ! मै गौरवान्वित हुई !
    और आप सबके प्रति आभारी हूँ !

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