शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

 मेरी पूरी दुनिया
धीरे धीरे
होती है जिबह
सर से पाँव तक
मैं होती हूँ
शर्मसार तुमपर
 मैं भी पांच वक़्त कि नमाजी हूँ
 दुआ करती हूँ
कि
 तुम सोचो मुकम्मल
क्या नहीं जानते तुम
कि
धूप निकलती है
 मुझे बिना छुए
 और हवाओं में हों
 जाती है खुश्बू कम
 मै बन   गयी हूँ
बुत
फिर भी
 मेरी आँखों में समायी है
 तुम्हारा सच देखने की
 तीखी चाह
कैसी है
ये बात
कि
 मुझे बनाकर
बुत
तुम  नहीं
  हों पुजारी
 नहीं हों
परस्त बुत  !!

20 टिप्‍पणियां:

  1. but to dilon mein basta hai.prem ko kavita ne bhakti bana diya hai.

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  2. मुझे बनाकर
    बुत
    तुम नहीं
    हों पुजारी
    नहीं हों
    परस्त बुत !!
    कहने दो उन्हें जो कहते हैं की वे बुतपरस्त
    नहीं हैं ,वे साँस लेते हैं तो यारे तस्वीर बन जाती है वे गर्दन भी झुकाते है तो तस्वीरे यार देखते हैं !
    किस कसक को तुमने वाणी दी है ,
    प्रज्ञा ! अब मै क्थ्य पढूं ,या की शिल्प !
    ढेर सारी शुभ कामनाएं !

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  3. मेरी पूरी दुनिया
    धीरे धीरे
    होती है जिबह
    सर से पाँव तक
    मैं होती हूँ
    शर्मसार तुमपर
    मैं भी पांच वक़्त कि नमाजी हूँ
    दुआ करती हूँ
    कि
    तुम सोचो मुकम्मल
    क्या नहीं जानते तुम
    कि
    धूप निकलती है
    मुझे बिना छुए
    और हवाओं में हों
    जाती है खुश्बू कम
    मै बन गयी हूँ
    बुत ......

    bahut achchi panktiyan.......... in panktiyon ne dil ko chhoo liya........

    bahut hi behtareen abhivyakti...

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  4. "मुझे बनाकर
    बुत
    तुम नहीं
    हों पुजारी
    नहीं हों
    परस्त बुत !!"

    सुन्दर कटाक्ष !

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  5. शुजा मौत से पहले ज़रूर जी लेना ये काम बहुत ज़रूरी है भूल न जाना

    ye panktiyaN bhi kuchh kam khubsurat nahiN.

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  6. नितांत व्यक्तिगत अनुभूति और तड़प से ले कर एक पूरे युग की निष्प्रहता को संबोधित करती रचना..बहुत दूर तक जाती है !!!

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  7. "मुझे बनाकर
    बुत
    तुम नहीं
    हों पुजारी
    नहीं हों
    परस्त बुत !!...

    Naari man ki bhaavnaaon ko aap bakhoobi utaarti hain apne shabdon mein ..
    ye rachna bhi us nari ki peeda ko darshaati hai jo khud to moorti ban jaati hai kisi ke liye .. par koi butparast nahi milta ..

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  8. बहुत ही सुन्दर कविता। गुस्से में भी भगवान ही याद आता है ना।
    नारी मन की यही कथा है।

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  9. प्रज्ञा ! मै खुद को कृष्णबिहारी जी के साथ खड़ा पा रही हूँ........हार्दिक बधाई .

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  10. प्रज्ञा जी ..नमस्ते........

    आपने कुछ नया नहीं लिखा?

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  11. मेरी आँखों में समायी है
    तुम्हारा सच देखने की
    तीखी चाह
    Man mein uthne wali halchal ki sundar bhavivykti.
    Badhai

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  12. एक भावपूर्ण रचना, जिसकी सराहना की जानी चाहिये.
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  13. मुझे बनाकर

    बुत

    तुम नहीं

    हों पुजारी

    नहीं हों

    परस्त बुत !

    badi achchhi baat aapne kavita ke maadhyam se kah di hai...
    mere blog ko bhi check karen....

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  14. मेरी पूरी दुनिया
    धीरे धीरे
    होती है जिबह
    सर से पाँव तक
    मैं होती हूँ
    शर्मसार तुमपर
    --बेहतरीन अभिव्यक्ति
    अंत में करारा कटाक्ष---
    -मुझे बनाकर बुत
    तुम नहीं हो पुजारी
    नहीं हो परस्त बुत ।
    --नारी की व्यथा का बखूबी चित्रण।

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  15. chittha charcha pe aapki post padhkar yahan chala aaya.vakai aap bahut achha likhti hai.

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  16. ek mandrata sa ehsaas o ghere hai kabse....tab se jab se pehli baar janm liya tha.... aur ghere raha aane wale har janm mein.... ab bhi mandra raha bheetar baahar har jagah .... har samay....

    Khoobsoorat rachna.... likhti rahiye....

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  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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