गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

तुम्हें जानती हूँ

तुम   अलस्सुबह   उठे   होगे
  तुम्हारी नींद  में क्या क्या
  हुआ होगा  !
जानती हूँ
  जल्दी  में भी   देर हुई होगी
  एक बाल तुम्हारा
दोनों भौहों के बीच  अटका   होगा
टाई  किस कसक के साथ   पहनी  होगी  !
 गुलाब को  टहनी
    तुम  ने
गहरी निगाहें डाल
 देखा होगा
  जानती हूँ   कि सुबह की चाय में
 मेरी महक होगी 
 वह  पूरे दिन   तुम्हें बेचैन रखेगी
  रात वह  तुम्हारी नींद में होगी
     और  तुम  चैन से सो पाओगे
  जुदा बात है
 कि  समंदर की तरह    छटपटाओगे
 और  बालुओं में घर  बनाओगे
 कहते हों कि ज़िन्दगी है  थोड़ी 
 लाख मैं कह दूँ कि थोडा हंस  लो भी
कहते हों   कि पहाड़ों से  होते हैं रस्ते !
  कहते हों कि शहर बड़ा हैं
पर सड़कें भी कम नहीं .!
   तुम   तलाशते हों सघन वन
यह भी
 कि तुमने  समय से  भिड़ने का
 मन बनाया था
  अब  कगार पर हों !
 कि तलछट में बचा है वक़्त  बहुत थोडा  और
  तुमने  कुछ  स्वप्न किये  थे  तय !
तुम्हें
जीना था उन्हें! 
 वही स्वप्न   खोजती हूँ
तुम्हें जानती हूँ इतना फिर भी
 तुम्हारे सपनों के मारे  जाने की वजहें  तलाशती हूँ  !!!

18 टिप्‍पणियां:

  1. ....सपनों की मौत....सपनों की हत्या....सपनों की ख़ुदकुशी......इस दुनिया में बहुत सी जिंदगियों की तकदीर बन चुकी है प्रज्ञा जी...!

    ....जब आप जैसे लोग इन सपनों के इस अंजाम की वजहें तलाश कर लेते हैं तो फिर वे मसीहा बन जाते है,,,,चारागर बन जाते हैं....तब उनके हाथों से फिर जो करिश्में होते हैं उन्हें देख कर लोग हैरान हो जाते हैं...एक तरफ जहाँ सपनों के हत्यारों को कंपकंपी छिड़ती है...

    वहां सपनों में भी दलेरी आ जाती है...
    उन्हें लगने लगता है कि जब मौत ही सामने है तो फिर यूं नहीं यूं सही...!....मरना ही है तो फिर ख़ुदकुशी या घुटन की मौत क्यूं...?

    तब सपने और उन्हें देखने वाले ही एक ऐसी दुनिया साकार करते हैं जहाँ सपनों की मौत नहीं होती...उस नयी दुनिया की तलाश भी अब आपको ही करनी और करवानी है....!

    आपकी यह रचना केवल एक भयावह सच नहीं तेज़ी से चली आ रही एक क्रांति की आंधी भी ही है...सपनों के हत्यारों के खिलाफ एक धर्म युद्ध का बिगुल भी....!

    ज़िन्दगी हर कदम इक नयी जंग है....!

    इस अच्छी रचना के लिए मुबारक हो....!


    रेक्टर कथूरिया
    http://punjabscreen.blogspot.com/2010/02/blog-post.html

    http://thespisnews.blogspot.com/2010/02/afghanistan-iran-iraq.html

    http://punjab-screen.blogspot.com/

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  2. kisi ek kshan mein jo vimb ubhar aaye. kavita hai.yadi usmein ras bhi ho to baat ban jati hai.kavita mein anumanit jeevan ke prati ek najariya hai. badhayee.
    krishnabihari
    abudhabi

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  3. यादों का गहरा दलदल अपने से बाहर नही आने देता ... जीवन की छटपटाहट कभी कभी बैचेन कर देती है ... मार देती हैं सपनो को विकसित होने से पहले ...... बहुत गहरी बात है आपकी रचना .....
    .... आपको महा-शिवरात्रि की बहुत बहुत बधाई .....

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  4. कि तलछट में बचा है वक़्त
    कि तुमने कुछ स्वप्न किये थे तय !
    भले थोडा पर तुम्हें
    जीना था उन्हें!
    वही स्वप्न खोजती हूँ
    पर पाती नहीं तुममें !!
    तुम्हारे प्रेम में जबकि मैं उतरी हुई हूँ
    तुम्हें जानती हूँ इतना और
    तुम्हारे सपनों के मारे जाने की वजहें तलाशती हूँ !!!
    बड़ी प्यारी सी प्रेम की कविता है ! बेरहम समय के हाथों से जो सपनो के पंख तितर बितर हो गये हैं !दोनों ही हैरान हैं की सब कुछ होने के बावजूद वह नहीं हुआ ,जो दोनों ने सोचा था !अब जब की तलछट का समय बचा है ...इस बेचैनी और कसक का बयान गज़ब है प्रज्ञा!
    स्त्री विमर्श के क्षेत्र में आगे बढती रहो ! बहुत बहुत बधाई !

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  5. ''समंदर की तरह छटपटाओगे'' ''समंदर की तरह छटपटाना''...........गजब !!!!!!!!! प्रज्ञा !!! यार कितना खुबसूरत बिम्ब रचा तुमने ? ,लेकिन जब समंदर तड़पेगा तभी न ज्वार-भाटा आएगा .....तभी न चाँद अपने शबाब पर होगा ......तभी न प्यासी धरती पर बारिश होगी ........तभी न मरुस्थल में उगेगी नर्म -नर्म हरी -हरी दूब ......तभी न हम और तुम होंगे लहालोट ?

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  6. कविता बहुत मार्मिक और सुन्दर है. मन संवेदनाओं से भर गया. धन्यवाद.
    लक्ष्मी कान्त

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  7. गहरे प्रेम की बड़ी कविता है यह, क्‍या कहूं सिवाय इसके कि अद्भुत है, मेरी पसंद की अभिव्‍यक्ति। बधाई।

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  8. zindagi se ziyada jandar kavita!prabhu aapki lekhni ko aur ras se bhar de......

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  9. कि तलछट में बचा है वक़्त
    कि तुमने कुछ स्वप्न किये थे तय !
    भले थोडा पर तुम्हें
    जीना था उन्हें!
    वही स्वप्न खोजती हूँ
    पर पाती नहीं तुममें !!
    तुम्हारे प्रेम में जबकि मैं उतरी हुई हूँ
    तुम्हें जानती हूँ इतना और
    तुम्हारे सपनों के मारे जाने की वजहें तलाशती हूँ
    कई बार ज़िन्दगी वजह तलाशते हुये ही खत्म हो जाती है। दिल के दर्द को बखूबी सुन्दर शब्दों मे ब्याँ किया है । शुभकामनायें

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  10. बहुत गहरी अभिव्यक्ति के साथ.... सुंदर व गूंथी हुयी ...शानदार रचना....

    आभार....

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  11. ..तुम्हारे सपनों के मारे जाने की वजहें तलाशती हूँ !
    ..वाह! प्रेम में डूबी इस शानदार अभिव्यक्ति के लिए बधाई.
    ..इस कविता को पढ़कर देर तक इसी में डूबे रहने का मन करता है.

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  12. प्रज्ञा जी
    दर्द को उकेरने का अच्छा साह्स दिखाया आपने....
    अच्छी रचना बधाई....अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनायें...... !

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  13. 'तुम्हारे सपनों के मारे जाने की वजहें तलाशती हूँ '' प्रज्ञा जी मैं तो आपके इस शीर्षक में ही गोते लगा रही हूँ

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  14. prahya ji

    bahut der se aapka blog padh raha hoon ... aur specially is poem ko kayi baar padha ....man ki kasak ko aapne acche shabd diye hai .. aap bahut accha likhtihai , meri badhayi sweekar kare..

    aabhar

    vijay
    - pls read my new poem at my blog -www.poemsofvijay.blogspot.com

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