गुरुवार, 21 जनवरी 2010

फूल पीले  मत बटोरो
   झरने दो !
 प्रियतम  की छुवन
 से खिले थे
 दहने दो !
प्रिय कब फिर आएंगे 
  कौन जानता है !
आएगा कब फिर   बसंत
  कौन जानता है !
अभी तो यादें  पुलकी   हैं 
साँसों में  साँसें  बहती   है !
 आग देह में जलती 
तभी सूरज भी तो 
मद्धिम है 
पीली है 
उसकी कांति
पूरी काली है   रात
 ताप  को जलने दो
फूल पीले  मत बटोरो
झरने दो !

19 टिप्‍पणियां:

  1. तभी तो पीला है सुरज
    मद्धिम है उसकी कांति
    पुरी काली है रात
    ताप को जलने दो
    पीले फ़ुल मत बटोरो
    झरने दो

    बेहतरीन, कविता बिना शीर्षक की है, कृपया शीर्षक दे दिया करें-आभार



    कब तक युवा रहेगा बसंत?
    चिट्ठाकार चर्चा

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  2. adbhutaas kavita... jeevan ki jivantata ko ukerti rachna...

    kuchh samay nikal kar is par bhi gaur karein...
    http://ab8oct.blogspot.com/2010/01/blog-post_20.html

    achha lage to humein follow karne ka kast karein...

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  3. फूल पीले मत बटोरो
    झरने दो
    प्रियतम की छुवन
    से खिले थे
    दहने दो .....

    सुंदर शब्दों से रची ..... सुंदर रवानी है इस रचना में .... बसंत के आगमन पर दिल में उठते जज्बातों का अच्छा चित्रण आयी .. ....... आपको वसंत पंचमी की बहुत बहुत शुभकामनाएँ .........

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  4. फूल पीले मत बटोरो
    झरने दो !
    प्रियतम की छुवन
    से खिले थे
    दहने दो !!!!!!!
    बड़ी कसक उठती है ,कचोट छा जाती है ,जिन पीले फूलों में अपने हिस्से का पूरा वसंत आया था ,अब वह झरने लगा है ,उसे तो झरना ही है !पर मन को कैसे समझाएं .....इसी तरह वसंत आता रहे जाता रहे ! अनंतशुभकामनाओं के साथ ....!

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  5. मुक्ता शर्मा (पमपम )ने कहा --
    प्रज्ञा जी ! आपकी कविता बहुत बहुत अच्छी लगी, वसंत के आते ही पीले फूल प्रियतम के छुवन का अहसास करा ही देते हैं !धन्यवाद !

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  6. ACHCHI KAVITA... PRAGA JI... PHOOL PEELE MAT BATORO JHARNE DO... WAAH

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  7. phoolon ko smritiyon mein sahej liya jaye to vasant ke aagman ki khushi dugni ho jaya karegi.
    krishnabihari

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  8. वसंत गया ही कब ? वह तो नित नूतन है ...हर पल में है हर उर में है और हर उम्र में भी ...वसंत तो हमारी शिराओं में है धमनियों में है .

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  9. सोचो तो हर लम्हा बसंत है और उलझो तो पतझड़ ..:) अच्छा लिखा आपने

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  10. मुझे तो पीले फूलों की माला गूथनी है आपके लिए....

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  11. कालिदास से लेकर आज तक वसंत कवियों को लुभाता है। उदय प्रकास ने अपने ब्लॉग में निराला की वसंत पर लिखी कविता डाली है। उसे भी पढ़ें। आपको पसंद आएगी। आपकी कविता भी अच्छी है, लोक संस्कृति और वसंत का गहरा रिश्ता है। आपकी कविता सुन्दर है। थोड़ा अनुभूति को अपने आस पास से जोड़ें ..... धन्यवाद ...

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  12. आएगा कब फिर बसंत
    कौन जानता है !
    अभी तो यादें पुलकी हैं
    साँसों में साँसें बहती है !
    आग देह में जलती है........


    बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ ..सुंदर कविता .... आपकी कविता बाँध कर रखती है.... और दिल को छू जाती है.....

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  13. तभी सूरज भी तो पीला है

    मद्धिम है उसकी कांति !

    पूरी काली है रात

    ताप को जलने दो

    kab phir aayega basant
    bahut sunder abhivayakti

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  14. aapke comment se man gadgad ho gaya
    aur sab tarif kar hi rahe hai.. :)

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