सोमवार, 26 जुलाई 2010

आकाश से ज़मीन की रह गुजर में ...............

हम  खो गए
 जैसे रास्तों पर
 खो जाते हैं पावों के निशान  
 फिर   खो 
 जाती है 
 स्फूर्ति सारी ताक़त सारा रस कहीं .!. .
 जैसे खो जाते हैं बादल बरस कर 
और फिर आकाश से ज़मीन की रह गुजर में 
 खो जाती है बूँद !
 हम ऐसे खो गए जैसे खो जाती है बिजली
 चमक्रकर बस एक बार
 गरजकर रह जाती है
 कहीँ दूर खोहों में पहाड़ों में !
 हम खो गए जैसे खो जाती है
 आवाज़ पुकार  कर   थक कर हार  !
 मगर फिर भी थे कहीं अनाम गुमनाम अनाकार  
अरूप ही सही   हम हवा की तरह 
  शायद   नहीं थे 
 हम  सिर्फ निशान  भर, न ही बूँद भर.
 न तो बस बिजली
 न सिर्फ आवाज़ भर ...
 

33 टिप्‍पणियां:

  1. शायद नहीं थे
    हम सिर्फ निशान भर, न ही बूँद भर.
    न तो बस बिजली

    बहुत सुन्दर और गहन रचना

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  2. हम हवा की तरह
    शायद नहीं थे
    हम सिर्फ निशान भर, न ही बूँद भर.

    bahut hi sunder kavita

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  3. तुम्‍हें
    हम ढ़ूंढ ही लेंगे
    आकाश में तारों के बीच
    जमीन पर अंगारों के बीच
    या फिर पाताल में पानी के जालों के बीच
    तुम कभी खो नहीं सकते

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  4. मंगलवार 27 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ .... आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  5. हम ऐसे खो गए जैसे खो जाती है बिजली
    चमक्रकर बस एक बार
    गरजकर रह जाती है
    कहीँ दूर खोहों में पहाड़ों में !


    बहुत सुन्दर रचना ! आपकी कल्पना बहुत सुन्दर है !

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  6. हम ऐसे खो गए जैसे खो जाती है बिजली
    चमक्रकर बस एक बार
    गरजकर रह जाती है
    कहीँ दूर खोहों में पहाड़ों में !
    हम खो गए जैसे खो जाती है
    आवाज़ पुकार कर थक कर हार !..
    इस तरह खोये हम कि खुद का पता भी ना पा सके ...
    ना बूँद भर , ना सिर्फ आवाज़ भर ....!
    सुन्दर ...!

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  7. अस्तित्‍व का सुन्‍दर चित्र.

    धन्‍यवाद.

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  8. kya bat hai prgya !
    yu kho kr bhi apna astitv mhsoos krna our use shbdo me pirona our ehsas bhi nirakar.gzab .

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  9. khone vaalon tum hmaare ujaas maahol ke hote kese kho jaaoge jhaan jaaoge hmen paaoge, bhut achchi prstuti he . akhtar khan akela kota rajsthan

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  10. मगर फिर भी थे कहीं अनाम गुमनाम अनाकार

    शब्दों के चक्र व्यूह को भेदती हुई
    सार्थक रचना ...

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  11. कविता बहुत अच्छी लगी... बहुत गहराई लिए हुए है....

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  12. जीवन के लंबे सफ़र में कोई नही रहता ... सभी गुम हो जाते हैं ... निशान खो जाते हैं ....
    टीस सी नज़र आती है आपकी रचना में ... दर्द की लकीर ... शायद यही जीवन है ....

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  13. इतना मुश्किल तो नहीं खुद का खो जाना...पानी की एक बूँद मात्र नहीं जो अपना अस्तित्व खो दें.
    सुंदर कविता.मन में मंथन करती सी.

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  14. गहरी वेदना और अदम्य जिजीविषा की ओर इंगित करती हुई एक बहुत ही सुन्दर और सम्पूर्ण रचना ! बधाई एवं शुभकामनाएं !

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  15. बहुत सुंदर...भावनाओं को उद्वेलित करती रचना.

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  16. हम सिर्फ निशान भर, न ही बूँद भर.
    न तो बस बिजली
    न सिर्फ आवाज़ भर ...
    आकाश से जमीन की रह गुजर में जो दिखाई देते हैं, केवल वह ही नही बल्कि मनुष्य को उपर उठने के लिए अनगिनत ,अदृश्य और अनंत सम्भवनायें है ! इस सशक्त कविता के लिए बधाई !

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  17. बहुत सुन्दर रचना ! आपकी कल्पना बहुत सुन्दर है !

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  18. हम खो गए जैसे खो जाती है
    आवाज़ पुकार कर थक कर हार
    बहुत सुंदर रचना.

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  19. शून्य से शिखर तक फिर खुद ही सिमट आने की कहानी कहती हुई कविता अपने शब्दों/भावनाओं के साथ मन छू लेती है।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  20. वाह, बहुत अच्छी कविता.....

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  21. ham kho gaye hain aise
    .............:)
    aapki kavita hi aisee hai.....:)

    shaandaar!!

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  22. हम ऐसे खो गए जैसे खो जाती है बिजली
    चमक्रकर बस एक बार
    गरजकर रह जाती है
    कहीँ दूर खोहों में पहाड़ों में !
    हम खो गए जैसे खो जाती है
    आवाज़ पुकार कर थक कर हार !
    ....बहुत अच्छी रचना.

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  23. हम ऐसे खो गए जैसे खो जाती है बिजली
    चमक्रकर बस एक बार
    गरजकर रह जाती है
    कहीँ दूर खोहों में पहाड़ों में !
    ...............
    sundar likha pragya tumne !!!!

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  24. Bahuton ke manki baat kah dee...aur badi khoobsoortee se kah dee..gumnamike andheron me rahguzar hoti rahti hai...

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