शनिवार, 15 जनवरी 2011

उमचन सी कसी जाती है

.भिगोकर बुनी जाती है

जितना हों सके खीचकर तानकर

जाती है बनायीं

उधेड़ दी जाती है आसानी से

औरत

बसखट की तरह होती है . .

कोई जगह नहीं मुकम्मल .

.कहीं भी जाती है .. बिछायी

.एक जगह से दूसरी जगह मांग ली जाती है

जिसकी होती है उसकी मर्जी बड़ी होती है

..दालान में ओसार में

दुआर पर खलिहान में मडई में

घर में कहीं भी पड़ी होती है .

धूप से आंधी पानी से जाती है बचाई

चलेगा बसखट के बिना कैसे काम

नींद कहाँ आएगी कैसे आयेंगे सपने

.जितनी पुरानी

उतनी नरम होती है

औरत बसखट की तरह होती है

आसान

हर बार खोली और बुनी जाती है

उमची जाती है कसी जाती है

34 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक संवेदनायें नारी जीवन पर।

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  2. उमचन ... बसखट ...मडई ...यह शब्द मेरे लिए नए हैं ... संकोच तो हो रहा है पर...

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  3. प्रज्ञा जी आपकी इस रचना ने भीतर से उद्वेलित कर दिया.. सुन्दर कविता...

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  4. एक मार्मिक और हृदयस्पर्शी रचना....... मनोभावों का बेहतरीन चित्रण

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  5. बहुत गहरी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति ....नारी मन के अंतर्द्वंद बखूबी शब्द दिए हैं आपने ...बहुत खूब

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  6. नारी जीवन का कटु सत्य है यह तो
    बहुत भावमय और यथार्थ

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  7. औरत बसखट की तरह होती है

    आसान

    हर बार खोली और बुनी जाती है

    उमची जाती है कसी जाती है
    प्रग्या जी नारी जीवन की यही सच्चाई है दिल को छू गयी ये मार्मिक अभिव्यक्ति। शुभकामनायें

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  8. बहुत अच्छी कविता के लिए साधुवाद ...शुभकामनायें

    http://nayasal.blogspot.com

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  9. जिसकी होती है उसकी मर्जी बड़ी होती है ........


    नारी जीवन की त्रासदी ,
    निर्मम बेचारगी का चित्रण किया आपने !
    सुन्दर शब्द, प्रभावशाली रचना !

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  10. स्त्री की दशा ही कुछ एसी है..नियति कहे। सोचने पर विवश करती हुई कविता, कई गवाक्ष खोलती है। इनके विरुध्द स्त्री की जो लड़ाई है हमें उस पर ध्यान देना चाहिए.हालात थोड़े बदल रहे हैं..ना हम कसे जाएंगे, ना हमें कोई मांग कर लेगा.हम कहीं भी पड़े रहने के खिलाफ खड़े हो चुके हैं। हमें यथास्थितिवाद स्वीकार नहीं।

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  11. Didi Ji aapki rachna Dil ko chu gayi..sanvedan sheel rachna.......

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  12. BAHUT DARD AUR KSHOBH HAI IS RACHNA MEIN ... NAARI MAN KO AUR USKE JEEVAN KO BAAKHOOBI LIKHA HAI AAPNE ...

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  13. ये हुई न बात ! औरत ने औरत पर लिखने के लिए कलम उठाया तो त्रासदी शब्द भी मुंह छुपा गया ! ये हाल है औरत का इस पि तृ सत्तात्मक व्यवस्था में !कलम की धार के लिए बधाई !

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  14. आसान

    हर बार खोली और बुनी जाती है

    उमची जाती है कसी जाती है

    saarthak to hai hi, kaafi hadd tak sahi bhi...

    lekin aisa hamesha ho jaruri nahi hai.....

    ek siddhant sarwopari hai..."yatra naaryaha pujyate ramante tatra devta"...........

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  15. आदरणीय प्रज्ञा पांडेय जी
    नमस्कार !
    गहरी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति
    ..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

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  16. Bahut hi marmik bhavnao se otprot nari ki gahri samvednao ko darshati hui Behatreen rachna...

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  17. kuchh nahin hai kahne ko mere paas....aisa kuchh bhi padhkar anmanaa sa ho jata hun main....!!

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  18. कडवी दवा की तरह लगी आपकी कविता.बहुत मुश्किल से झेल पाया .बहुत ही सटीक और
    सपष्ट.सच कडवा ही होता है.बहुत ही उम्दा रचना है.औरत का सही चित्रण औरत ही कर सकती है.आप की कलम को बधाई.

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  19. aapki her rachna mein stree ka shashwat marm hai ... her ek pagdandiyaan aansuon se nam suraj ki khwaahish karti hain

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  20. मार्मिकता से परिपूर्ण रचना।

    -------
    क्‍या आपको मालूम है कि हिन्‍दी के सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग कौन से हैं?

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  21. हर बार खोली और बुनी जाती है
    उमची जाती है कसी जाती है

    बहुत भावपूर्ण कविता.....

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  22. भिगोकर बुनी जाती है

    जितना हों सके खीचकर तानकर

    जाती है बनायीं

    उधेड़ दी जाती है आसानी से
    !!!!!!!!!!!!!!!!!!
    तुम्हारी कविता यथार्थ से मुठभेड़ कर रही है ...अभी भी कमोवेश हालात वैसे ही हैं ...अब ऐसे मे स्त्री को ही सोचना होगा अपने बारे मे ...उसे ही चुनने होंगे रास्ते ... और चलने का माद्दा भी बटोरना होगा ...उसे अपनी जगह बनानी ही होगी ...अपने लिए खुशियों का एक नया आकाश उसे ही रचना होगा !

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  23. काफी सधी हुई रचना है.... नई कविता में यही नयापन है कि एकदम अनछुए, नए और सार्थक बिम्ब और दृश्‍य कविता में आए हैं.. जैसे इसी में अमचन का खोलना, कसना जैसी क्रियाएं.... बधाई

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  24. भावों को सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है आपने।पोस्ट बेहतरीन है।

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  25. प्रज्ञा जी बहुत सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया आपने जीवन दर्शन और स्त्रियों की अवस्था पर कटाक्ष सुंदर कविता के माध्यम से. नया बिम्ब प्रयोग. बधाईयां.

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  26. ourat ki vivshta ko benkab krti arthyukt abhivykti ke liye sadhuwaad .bavjood iske vosshkt hai our rhegi .

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  27. rachna ne nishabd kar diya ..

    badhayi sweekar kare..

    -------------------

    मेरी नयी कविता " तेरा नाम " पर आप का स्वागत है .
    आपसे निवेदन है की इस अवश्य पढ़िए और अपने कमेन्ट से इसे अनुग्रहित करे.
    """" इस कविता का लिंक है ::::
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/02/blog-post.html
    विजय

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